Thursday, January 15, 2026

असम के बिश्वनाथ जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर स्थित बिश्वनाथ घाट को इसके अत्यधिक धार्मिक महत्व के कारण ‘गुप्त काशी’ कहा जाता है।बिश्वनाथ घाट (गुप्त काशी) के मुख्य बिंदुःऐतिहासिक महत्वः इस स्थल का नाम प्राचीन बिश्वनाथ मंदिर के नाम पर रखा गया है। गुप्त काल के दौरान इसे वाराणसी (काशी) के समकक्ष माना जाता था, जिससे इसका नाम ‘गुप्त काशी’ नाम से जाना जाता है।

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तारीख:29/12/2025
पता: विश्वनाथ घाट (असम)

विश्वनाथ। विश्वनाथ का मतलब विश्व का नाथ, विश्व का मालिक। विश्व के मालिक का अधिष्ठान क्षेत्र यह विश्वनाथ। ‘विश्वनाथ’ का अधिष्ठान क्षेत्र वाराणसी को काशी कहते हैं, इसलिए विश्वनाथ का अधिष्ठान क्षेत्र यह विश्वनाथ भी काशी है। लेकिन इस विश्वनाथ को ‘गुप्तकाशी’ कहते हैं। गुप्तकाशी का अर्थ यह है कि यह काशी के नाम से जानी नहीं जाती। किंवदंती के अनुसार ‘कुमूद’ और ‘कौस्तुभ’ नाम के दो मुनियों के शाप से विश्वनाथ ‘गुप्तकाशी’ हो गए।
अतीत में शोणितपुर बाणासुर का राज्य था। बलि का पुत्र बाण। बलि को विष्णु ने छल करके पाताल भेजा, उसके बाद बाण ने शिव की तपस्या करके पितृराज्य शोणितपुर वापस पा लिया। बाण बहुत शिवभक्त था। वह प्रतिदिन एक ‘शिव’ बनाकर पूजा करता था। पूजा से संतुष्ट होकर महादेव ने एक रात राजा को स्वप्न में कहा- “मैं तुम्हारे राज्य में स्वयंभू काशी के रूप में विराजमान हूँ। ब्रह्मपुत्र के तट पर तपस्या कर रहे कुमुद और कौस्तुभ नाम के दो मुनियों से पूछकर मेरा स्थान निर्धारित करो और मेरी पूजा करो।”
राजा अगले दिन दोपहर में रेत पर चलते हुए ब्रह्मपुत्र के तट पर तपस्या कर रहे मुनियों के पास पहुँचे और ‘कुत्रकाशी’ (काशी कहाँ है) कहकर विश्वनाथ की अवस्थिति के बारे में प्रश्न किया। दोनों मुनि ध्यान में मग्न थे, इसलिए उन्होंने राजा का प्रश्न नहीं सुना और इसलिए कोई उत्तर भी नहीं दिया। दोपहर की तेज धूप में, तपती रेत पर चलते-चलते परेशान हुए राजा ने दो बार प्रश्न करके भी मुनि से कोई उत्तर नहीं पाया और गुस्से में ‘कुत्रकाशी’ चिल्ला उठे और उस चिल्लाहट से दोनों मुनियों का ध्यान भंग हो गया। ध्यान भंग होने पर मुनियों को भी गुस्सा आया और तुरंत उन्होंने ‘गुप्तः काशी’ गुस्से से कहा। मुनियों के मुँह से निकला यह शब्द परोक्ष रूप से विश्वनाथ पर अभिशाप हो गया। आकस्मिक रूप से इस प्रकार अभिशप्त होकर वहीं शिव प्रकट हुए और मुनिद्वय को संबोधित करते हुए कहा कि ब्राह्मणों, तुम लोगों ने अपने स्वाभाविक गुण शम, दम, दया, क्षमा को भूलकर अकारण ही मुझे अभिशाप दिया। तुम लोगों का हृदय दया-मायाहीन ‘पत्थर जैसा’ है। महादेव के मुँह के ये शब्द भी परोक्ष रूप से दोनों मुनियों पर अभिशाप हो गए और तुरंत वे दोनों पत्थर होकर आने लगे। तब दोनों मुनियों ने महादेव की असीम स्तुति करके कहा – ‘हे प्रभु, होनी अटल है। हम दोनों को इस प्रकार श्रापग्रस्त होना ही था।

महादेव ने कहा- “कलियुग के अंत में डिक्रोंग नदी के पूर्व में ईशान कोण में सप्त-श्लेशर युद्ध होगा। उस युद्ध में मृत सैनिकों, घोड़ों और हाथियों का खून ब्रह्मपुत्र से बहकर तुम्हारे शरीर को छूने पर तुम मुक्त हो जाओगे। जब तुम मुक्त होकर अपने कमंडलु के जल से मुझे स्नान कराओगे, तब मैं शापमुक्त हो जाऊंगा।” मुनि ने फिर पूछा, “कलियुग का अंत कब होगा?” महादेव ने कहा, “असमय में पेड़ों पर फल लगेंगे, ब्रह्मपुत्र से सियार पार होंगे, मनुष्यों का कोई विवेक नहीं रहेगा। अंत तक अन्न और योनि का विवेक रहेगा, अंत में वह भी नहीं रहेगा। तभी कलियुग का अंत समझना। तब तक मैं गुप्त रहूंगा। मेरे पास से ही आओगे, मुझे पहचान नहीं पाओगे। परम भक्त ही मुझे ढूंढ पाएगा।” यह कहकर महादेव अंतर्धान हो गए।
कुमुद और कौस्तुभ के शाप के कारण विश्वनाथ ‘गुप्तकाशी’ बने हुए हैं और महादेव के शाप के कारण दोनों मुनि अभी भी शिलाघाट के पास ब्रह्मपुत्र के तट पर पत्थर बने हुए हैं। इन दो बड़े पत्थरों को ‘दोईमुनि शिला’ के नाम से जाना जाता है।
रायबहादुर आनंद चंद्र अगरवाला देव ने अपने ‘असमर पूराबृत्त’ नामक निबंध में लिखा है, “कुमुद और कौस्तुभ नाम के च्यवन के मानसपुत्र दो थे। बाण राजा के प्रश्न का उपहास करने के कारण शिव के कोप से ‘दोईमुनि शिला’ के रूप में ख्याति प्राप्त की है।”
एक अन्य किंवदंती के अनुसार, एक करोड़ शिवलिंगों की अधिष्ठान स्थली विश्वनाथ पूर्णकाशी थी। लेकिन पृथ्वी पर दो काशी होने से मोक्ष प्राप्त करने वाले जीवों की संख्या बढ़ जाएगी और अंत में सृष्टि ही समाप्त हो जाएगी, इस आशंका से देवताओं ने एक शिवलिंग विश्वनाथ क्षेत्र से चुराकर ब्रह्मपुत्र
के उस पार हाथीमूरा पर्वत के पास के पर्वत पर स्थापित कर दिया। वह ‘शिव’ अब ‘बाणेश्वर शिव’ नाम से जाना जाता है। विश्वनाथ के लिए चढ़ाया जाने वाला पूजा का बहुत सा भाग दक्षिणपारीय जनता उसी शिव को देती है। शिवरात्रि पर उस शिव देवालय में जनता और ठाकुर दोनों मिलकर शिवरात्रि उत्सव मनाते हैं। इधर विश्वनाथ एककोटि में एक ‘शिव’ कम उनजनकोटि शिव का स्थान हो गया। विश्वनाथ में रहने वाला प्रत्येक पत्थर एक-एक शिव है। इसलिए यहां के पत्थर तोड़ने या स्थानांतरित करने नहीं चाहिए।
वृद्धगंगा और ब्रह्मपुत्र के संगम स्थल पर एक पत्थर के गर्भगृह में महाप्रभु विश्वनाथ शिवलिंग विद्यमान है। एक ही पत्थर में गर्भगृह और वह शिवलिंग सृष्टि हुई है।

प्रकृति की अद्भुत सृष्टि। यह स्वयंभू है, यानी खुद-ब-खुद हुई है। किसी ने इसे बनाया नहीं है। पत्थर पृथ्वी का एक हिस्सा है। पृथ्वी की सृष्टि के साथ ही विश्वनाथ शिवलिंग का भी निर्माण हुआ है। बाण ने कुमुद और कौस्तुभ की सहायता से केवल विश्वनाथ का स्थान निर्धारित किया था। इस प्रकार ‘वृद्ध गंगा’ यानी बूढ़ीगांग नदी के जल के अंत में, ब्रह्मपुत्र के पानी के बीच में (यानी वृद्ध गंगा और ब्रह्मपुत्र के संगम पर) विश्वनाथ शिवलिंग और योनिमंडलरूपिणी विश्वदेवी विराजमान हैं। पूर्वकाल में जगतपति भगवान विष्णु ने यहाँ हयग्रीव असुर के साथ युद्ध किया था और हयग्रीव को मारकर हाजो के मणिकूट में जाकर निवास किया था। कालिकापुराण में नाटक पर्वत से (जहाँ महादेव का आश्रम है) बहकर आने वाली वृद्धगंगा नदी को गंगा के समान फलदायिनी कहा गया है, ‘वृद्धगंगाह्वया सा तु गंगेर फलदायिनी।’ जहाँ भैरव शिव हैं, वहीं भैरवी शक्ति है। कामाख्या भैरवी; थोड़ी दूरी पर ‘उमानंद’ भैरव स्थित हैं। ‘महाभैरव’ से थोड़ी दूरी पर भैरवी। उपरोक्त वर्णन से विश्वनाथ में भैरव-भैरवी, विश्वदेव और विश्वदेवी एक साथ स्थित होना प्रतीत होता है। रायबहादुर आनंद अगरवालादेव ने ‘कामरूपर तीर्थ विवरण’ निबंध में कहा है, ‘बूढ़ीगांग नदी के मुहाने पर विश्वनाथ शिव और भगवती विश्वदेवी के देवालय स्थित स्थान पर कोई मंदिर या घर नहीं है।’ विश्वनाथ के शक्तिपीठ चंडी और उमा देवालय में भैरव और भैरवी एक साथ हैं। लेकिन स्पष्ट रूप से सटे हुए दो अलग-अलग कुंड हैं। विश्वनाथ गुफा में हालांकि ऐसा स्पष्ट अंतर दृष्टिगोचर नहीं होता है।

बरसात में ‘विश्वनाथ शिव लिंग’ पानी में डूब जाता है। कार्तिक महीने में निकलता है। ‘गोसाईं’ के निकलने पर, बालू खोदकर साफ किया जाता है, घर बनाया जाता है और आघोन महीने के एक शुभ दिन में साल की पहली पूजा शुरू की जाती है। उस दिन से बोहाग बिहू के ‘गोसाईं फुरोवा’ (घुमाने) दिन तक, यानी बोहाग के दो तारीख के ‘गोसाईं बिहू’ के दिन तक दैनिक पूजा होती है। आमतौर पर उस दिन गंभीर (जगह) पानी से भर जाता है। पानी में पूजा करके वापस तट के ‘विश्वनाथ’ को अहोम राजाओं के समय की ‘केंकोरा डोला’ (पालकी) में उठाकर तीन मील दूर भीर गाँव ले जाया जाता है। भीर गाँव विश्वनाथ महाप्रभु के ठाकुर-देउरी (पुजारी) का गाँव है। उस गाँव का नामघर ‘विश्वनाथ का नामघर’ है। ‘गोसाईं फुरोवा’ विश्वनाथ का राजाओं के समय का प्राचीन और मुख्य उत्सव है। गोसाईं की पालकी के ऊपर ‘आरोवाण’ (छत्र/शमीयाना) पकड़कर ठाकुर, देउरी और जनता भी शोभायात्रा के साथ उत्सव मनाते हुए गोसाईं को घुमाने ले जाते हैं, यह अद्भुत दृश्य जिसने एक बार देखा है, वह धन्य हो गया है। राजा के समय में, जब राजा घूमने निकलते थे तो तीन ‘आरोवाण’ लिए जाते थे। बूढ़ागोसाईं, बरगोसाईं, बरपात्र गोसाईं, ये तीनों मंत्री जब घूमने निकलते थे तो प्रत्येक एक-एक ‘आरोवाण’ लेते थे और ‘विश्वनाथ महाप्रभु’ जब घूमने निकलते थे तो सात ‘आरोवाण’ लेने का नियम था। यह नियम आज भी पाला जाता है। लेकिन भक्तों द्वारा मान करके दिए गए आरोवाणों की संख्या आजकल सौ के आसपास हो गई है।
तट के विश्वनाथ में बारह महीने पूजा होती है। पानी के विश्वनाथ के निकलने पर वहाँ भी दैनिक पूजा होती है।

पानी के बिस्वनाथ निकलने पर वहाँ भी दैनिक पूजा होती है। बिस्वनाथ की पूजा बंद नहीं होती। किसी कारणवश पूजा बंद होने पर राजा-प्रजा और पृथ्वी का अमंगल होगा, ऐसा विश्वास है। तट और पानी दोनों जगहों पर बिस्वनाथ के होने के कारण लोग कहते हैं- ‘बिस्वनाथ गोसाईं लबक- फरक़, छह महीने जल में छह महीने तट पर।’
बिस्वनाथ में बिस्वनाथ को आदि करके सत्ताईस देवालय हैं। उनमें से एक देवालय ‘बूढ़ा माधव या बूढ़ा गोसाईं’ बिस्वनाथ से अनुमानित १६ कि.मी. दूर प्रतापगढ़ बागान में है। बाकी छब्बीस बिस्वनाथ और उमाटुमनी में हैं। उमाटुमनी बिस्वनाथ के पास स्थित ब्रह्मपुत्र के बीच का एक छोटा द्वीप है। यह एक ऊँचा टीला है। यहाँ उमा देवी का मंदिर है। इसलिए इसे उमाटुमनी कहते हैं। यहीं उमा ने तपस्या करके शिव से साक्षात्कार किया था।
‘शिव’ जिस जगह प्रकट हुए, उसी जगह बिस्वनाथ शिवलिंग की स्थापना हुई। शिव की पत्नी सती ने दक्ष-यज्ञ में देह त्याग करके फिर हिमालय राजा की.
वृत्ति, सोना-चाँदी की कोशा-अर्घा, सोने का लघुन, मकर कुंडल एक जोड़ा, देवालय का काम करने वाले लोग, पाइक, नटी, बिल आदि दान करके, पुत्र-पौत्रादिक्रम से राजा के मंगल के लिए विश्वनाथ की पूजा देते रहने के लिए ताम्र-पत्र देकर स्थापित किया गया। तभी से विश्वनाथ की सेवा-पूजा नियमित रूप से चल रही है।
विश्वनाथ का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं था। ‘असमर पूराबृत्त’ निबंध में रायबहादुर आनंद चंद्र अग्रवाल देव ने लिखा है- “… उक्त बुरंजी (कामरूप की बुरंजी) से पता चलता है कि धर्मपाल के छोटे भाई मणिचंद्र की पत्नी मौनवती ने धर्मपाल को युद्ध में हराकर कामरूप पर अधिकार कर लिया, तो धर्मपाल सपरिवार भागकर ऊपरी असम की ओर आ गए थे। उनके बेटे बटुपाल ने विश्वनाथ में राजत्व किया। उनके बेटे सोमपाल ने कन्याका में राजधानी बनाई थी। सोमपाल के पोष्यपुत्र भालुकपेंग या प्रताप सिंह बड़े प्रतापी राजा थे।

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